जल: अस्तित्व, संघर्ष और भविष्य

जल ही जीवन है। यह अक्सर कहे-सुने जाने वाला वाक्य है। पानी के आसपास हमेशा जीवन खिलता और मिलता है। हमारा इतिहास नदी घाटी सभ्यताओं के विवरण से भरा हुआ है। पानी इस कदर हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी से जुड़ा हुआ है कि हम अक्सर इसकी अहमियत और किल्लत को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

एक बच्चा जब होश संभालता है, तो आसमान से गिरती बारिश उसे जादू सरीखी लगती है। न जाने कितने पेड़, पक्षी और सूक्ष्म जीव बारिश के आने पर जी उठते हैं। ख़ासकर पहाड़ों में बारिश वहाँ की स्थानीय खेती के लिये पहली ज़रूरत है। पहाड़ों से नदियां निकलती तो हैं, पर वहाँ ठहरती नहीं। नदियों के मैदानों में बह जाने के बाद पहाड़ों की खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर रहती है। मैंने अपने अब तक के जीवन का अधिकांश हिस्सा उत्तराखंड के पहाड़ों में बिताया है। गंगा और यमुना के साथ-साथ उत्तराखंड की लगभग सभी प्रमुख नदियों के उदगम किसी न किसी ग्लेशियर में स्थित हैं। आज बढ़ते वैश्विक तापमान से हिमालय पिघल रहा है। नदियों का अस्तित्व संकट में है। आने वाले कुछ वर्षों में, जब नदियां पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी, तो इन पहाड़ों में बची-खुची खेती के साथ जीवन की सभी संभावनाएं भी नष्ट हो जाएंगी। पलायन के कारण पहले ही खाली हो चुके उत्तराखंड के गांवों में खेती अब भी भविष्य की एक उम्मीद जगाती है। इसीलिए पानी के अलग-अलग रूपों को बचाना और बढ़ाना ज़रूरी है। कुछ प्रयास छोटे तालाबों / चालखाल आदि के रूप में दिख रहे हैं, लेकिन वे अभी पर्याप्त नहीं दिखते। इस बीच पहाड़ी कस्बों में ट्यूबवेल खुदवाने का नया चलन आया है। हर सक्षम व्यक्ति अपना एक अलग कुआँ खुदवाकर ज़मीन के अंदर से पानी को खींच लेना चाहता है। लालच का यह नया रूप है, जो तेज़ी से “न्यू नार्मल” बनता जा रहा है। जब सब खाली हो जायेगा, तो क्या शेष रहेगा?

नदी, बारिश और प्राकृतिक जल स्रोतों का पानी बचाकर जीवन की उम्मीदों को बचाया जा सकता है। सामुदायिक चेतना, राजनीतिक मंशा, जन प्रयास, वैज्ञानिक तकनीक व पारंपरिक ज्ञान के समावेश से पानी से जीवन के रिश्ते को और बेहतर बनाने का सबसे ज़रुरी समय अब शुरू हो गया है।

बड़े सपनों की ईटें छोटे प्रयासों की नींव पर ही रखी जाती है।

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